ज़िंदगी क्या है,
एक आइना अपने करमों का,
कुछ खट्टी ,कुछ मीठी और कुछ अधूरी खवाहिसो का
कुछ कहीं , कुछ अनकही लफ़्ज़ों का,
कुछ पूरी ,कुछ अधूरी फ़रमियासो का,
समय का जो काल चक़्र, कभी रुकता नही किसी के ज़ोर से
रेत का ये सम्प्रभा , चलता निरंतर किसी के रोक से
थमती तो साँसे है, रुकती तो बातें है,
समय का ज़ोर कभी थमता नही किसी ओरसे
कुछ बातें कभी हंसाती है , कभी रुलाती है
बातें कुछ बचपन की, यादें कुछ छुटपनकी
ये कुछ नी बस यादों का पिटारा है, चलता उमर भर सारा है
जिसका जीकर वो बचपन के साथी से हो या जीवनशाथी से
ये जमापूँजी है अपने कारमो का , ये आइयना है अपने सपनो का
ज़िंदगी क्या है।
एक यादें उन बीती बातो का
कुछ साथ चले और कुछ छूट जाने वाले उन रिस्तेओन का,
कुछ सुनी, कुछ उनसनी उन कहानियो का
दादा दादी , नाना नानी के सिखाई हुई वो बातों का
जो पहले निभाई थी और आगे निभेगी उनपर टिकी उन्न उमीदो का
ये परिवर्तन है, जो आज है ,कल कुछ और होंगी
ये नियम है,जो बदलती सभ्यता की सोच होंगी
ये दौर है, जो भागती हुई आकाँक्षाओं की डोर होगी
बनना तो पानी है जिसको मिलना है सागर में
अहम , द्वेष और कटुता भी आग में ही भस्म होगी
ज़िंदगी क्या है. एक आयींना अपने कारमो की ।
No comments:
Post a Comment